विभूति परिचय- हनुमान प्रसाद पोद्दार

   विभूति परिचय -  भाई हनुमान प्रसाद पोद्दार 






 भारतवर्ष में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो गीता प्रेस को नही जानता।आज गीता प्रेस गोरखपुर का नाम किसी भी भारतीय के लिए अनजाना नहीं है। सनातन हिंदू संस्कृति में आस्था रखने वाला दुनिया में शायद ही कोई ऐसा परिवार होगा जो गीता प्रेस गोरखपुर के नाम से परिचित नहीं होगा। इस देश में और दुनिया के हर कोने में रामायण, गीता, वेद, पुराण और उपनिषद से लेकर प्राचीन भारत के ऋषियों -मुनियों की कथाओं को पहुँचाने का एक मात्र श्रेय गीता प्रेस गोरखपुर के आदि-सम्पादक भाईजी श्रीहनुमान प्रसाद पोद्दार को है। प्रचार-प्रसार से दूर रहकर एक अकिंचन सेवक और निष्काम कर्मयोगी की तरह भाईजी ने हिंदू संस्कृति की मान्यताओं को घर-घर तक पहुँचाने में जो योगदान दिया है।


परिचय-

जन्म- 6 अक्तूबर 1892 ईसवीं 

स्थान- रतनगढ़,राजस्थान 

पिता- भीमराज अग्रवाल

माता- रिखीबाई 

गुरु- निंबार्क सम्प्रदाय के संत ब्रजदास जी महाराज 


राष्ट्र हेतु कार्य- 

1.कलकत्ता में ये स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारियों अरविंद घोष, देशबंधु चितरंजन दास, पं झाबरमल शर्मा के संपर्क में आए और आज़ादी आंदोलन में कूद पड़े। 

2.इसके बाद लोकमान्य तिलक और गोपालकृष्ण गोखले जब कलकत्ता आए तो भाई जी उनके संपर्क में आए इसके बाद उनकी मुलाकात गाँधीजी से हुई।

3.वीर सावकरकर द्वारा लिखे गए '१८५७ का स्वातंत्र्य समर ग्रंथ' से भाई जी बहुत प्रभावित हुए और १९३८ में वे विनायक दामोदर सावरकर से मिलने के लिए मुंबई चले आए।

4.१९०६ में उन्होंने कपड़ों में गाय की चर्बी के प्रयोग किए जाने के खिलाफ आंदोलन चलाया

5.विदेशी वस्तुओं और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के लिए संघर्ष छेड़ दिया। युवावस्था में ही उन्होंने खादी और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना शुरु कर दिया।

6.विक्रम संवत १९७१ में जब महामना पं. मदन मोहन मालवीय बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए धन संग्रह किया।

7.मुंबई में उन्होंने अग्रवाल नवयुवकों को संगठित कर मारवाड़ी खादी प्रचार मंडल की स्थापना की।

8.२९ अप्रैल १९२३ ई० को गीता प्रेस की गोरखपुर में स्थापना की।

9.अक्षय तृतीया (वैशाख शुक्ल तृतीया ) से कल्याण   पत्रिका का आरम्भ कर दिया।

10.बद्रीनाथ, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम, द्वारका, कालड़ी श्रीरंगम आदि स्थानों पर वेद-भवन तथा विद्यालयों की स्थापना में भाईजी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने जीवन-काल में भाई जी ने २५ हजार से ज्यादा पृष्ठों का साहित्य-सृजन किया।


इनकी मृत्यु 22 मार्च 1971 को हुुई। 
भारत सरकार द्वारा इनकी स्मृति में 1992 में डाक टिकट जारी किया गया था। 

©️ राष्ट्रवादी साहित्य 



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