व्यक्ति विशेष-" मुत्तुस्वामी दीक्षित (महान संगीतज्ञ दक्षिण भारत )
व्यक्ति विशेष - "मुत्तुस्वामी दीक्षित"(दक्षिण भारत के महान संगीतज्ञ)
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| 1976 में भारत सरकार द्वारा जारी किया गया डाक टिकट |
मातेश्वरी माँ भारती के गर्भ से समय - समय पर भारतवर्ष में अनेकों महान विभूतियों का जन्म हुआ है। भारत की भूमि ऐसे महान परिचयों से भरी हुई है। ऐसे ही एक परिचय है- मुत्तुस्वामी दीक्षित।
मुत्तुस्वामी दीक्षित का जन्म 1775ई० में तिरुवारूर,तंजावुर, तमिलनाडु में हुआ था।
जन्म- 24 मार्च 1775
जन्म स्थान-तिरुवारूर, तंजावुर, तमिलनाडु, भारत
गायन शैली- कर्नाटक संगीत,
शास्त्रीय संगीतकार।
पिता - रामस्वामी दीक्षित।
मुत्तुस्वामी के बचपन से ही उन्हें धर्म, साहित्य, अलंकार और मन्त्र ज्ञान की शिक्षा दी गयी तथा उन्होंने संगीत की शिक्षा अपने पिता से ली थी।
मुत्तुस्वामी के किशोरावस्था में ही, उनके पिता ने उन्हें चिदंबरनथ योगी नामक एक भिक्षु के साथ तीर्थयात्रा पर संगीत और दार्शनिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेज दिया था।
इस तीर्थयात्रा के दौरान, उन्होंने उत्तर भारत के कई स्थानों का दौरा किया और धर्म और संगीत पर एक व्यापक दृष्टिकोण प्राप्त किया जो उनकी कई रचनाओं में परिलक्षित होती थी। काशी (वाराणसी) में अपने प्रवास के दौरान, उनके गुरु चिदंबरनाथ योगी ने मुत्तुस्वामी को एक अद्वितीय वीणा प्रदान की और उसके शीघ्र बाद ही उनका निधन हो गया। चिदंबरनाथ योगी की समाधि अब भी वाराणसी के हनुमान घाट क्षेत्र में श्रीचक्र लिंगेश्वर मंदिर में स्थित है। गुरु के देहान्त के बाद मुत्तुस्वामी दक्षिण भारत को लौटे। जब तब वह चिदम्बरनाथ योगी के साथ रहे, उन्होंने उत्तर भारत में काफी भ्रमण किया व काफी कुछ सीखने को मिला।
पौराणिक दन्तकथाओं के अनुसार
मुत्तुस्वामी के गुरु ने उन्हें तिरुट्टनी (चेन्नई)की यात्रा करने के लिए कहा। वहां, जब वे ध्यान मुद्रा में बैठे थे, तभी एक बूढ़ा आदमी उनके पास आया और मुंह खोलने के लिए कहा। बूढ़ा आदमी उनके मुंह में शक्कर की मिठाई रखकर गायब हो गया। जैसे ही उन्होंने अपना मुंह खोला, उसे मुरुगन देवता का दृष्टांत हुआ, और उसके बाद ही मुत्तुस्वामी ने अपनी पहली रचना "श्री नाथादी गुरूगुहो" को राग मेयामलवागोला में गाया।
इस गीत ने भगवान को संस्कृत की पहली विभक्ति में संबोधित किया, बाद में दीक्षित ने भगवान के सभी आठ अवतारों पर कृतियों की रचना की। ये ज्यादातर संप्रदाय/अनुग्रहवादी रूप में मुरुगन की स्तुति करने वाले उपधाराओं में थे।
फिर मुत्तुस्वामी तीर्थाटन के निकल गये और कांची, तिरुवन्नमलई, चिदंबरम, तिरुपति और कालहस्ती, श्रीरंगम के मंदिरों की यात्रा और वहाँ कृतियों की रचना की और तिरुवारूर लौट आये।
जीवन सत्य मृत्यु-
मुथुस्वामी दीक्षित सन् 1835 को दीपावली की अद्भुत, दिव्य व पावन वेला पर प्रत्येक दिन की तरह पूजा-प्रार्थना की। तत्पश्चात उन्होंने अपने विद्यार्थियों को "मीनाक्षी मुदम् देहि" गीत गाने के लिए कहा। यह गीत पूर्वी कल्याणी राग मे रचा गया था। वे आगे भी कई गीत गाते रहे, जैसे ही उन्होंने "मीन लोचनि पाश मोचनि" गाना शुरु किया। तभी मुत्तुस्वामी ने अपने हाथों को उठाते हुए "शिवे पाहि" (इसका अर्थ हे भगवान! मुझे क्षमा करना!) कहकर दिवंगत हो गए। उनकी समाधि एट्टैय्यापुरम (यह महाकवि सुब्रह्मण्य भारती का जन्म स्थल भी है) में है।।
©️राष्ट्रवादी साहित्य

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