भारतवर्ष में राष्ट्रवाद की प्राचीन अवधारणा।
भारतवर्ष में राष्ट्रवाद की प्राचीन अवधारणा
साधारण रुप से प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्रवाद का भारत में उदय पश्चिमी देशों की विचारधारा से उत्पन्न हुआ मानतें है।
कई पश्चिम के विद्वान/ इतिहासकार इस बात को यह मानने लगते हैं कि ब्रिटिश लोगों के कारण ही भारत में राष्ट्रवाद की भावना ने जन्म लिया; राष्ट्रीयता की चेतना ब्रिटिश शासन की देन है और उससे पहले भारतीय इस चेतना से अनभिज्ञ थे। पर यह सत्य नहीं है। वरन् भारतीय सभ्यता में राष्ट्र प्रथम की भावना सदियों से चली आ रही है। इसका वर्णन हमारी पौराणिक कथाओं में मिलता है। इन्ही तथ्यों को इस लेख के माध्यम से प्रस्तुत कर रहा हूँ।
वस्तुतः भारत की राष्ट्रीय चेतना वैदिककाल से अस्तित्व में है। अथर्ववेद में वर्णित पृथ्वी सूक्त में धरती माता का यशोगान किया गया हैं। जो इस प्रकार है
"माता भूमिः पुत्रोsहम पृथिव्याः" ।
पृथ्वी हमारी माता है और हम इसके पुत्र हैं
मातृभूमि के प्रति पग पग पर कृतज्ञता व्यक्त की गयी है।
विष्णुपुराण में तो राष्ट्र के प्रति का श्रद्धाभाव अपने चरमोत्कर्ष पर दिखाई देता है। इस में भारत का यशोगान 'पृथ्वी पर स्वर्ग' के रूप में किया गया है।
"अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महागने।
यतोहि कर्म भूरेषा ह्यतोऽन्या भोग भूमयः॥"
"गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारत-भूमि भागे।
स्वर्गापस्वर्गास्पदमार्गे भूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ।।"
रामायण में रावणवध के पश्चात राम, लक्ष्मण से कहते हैं-
"अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥"
अर्थ : हे लक्ष्मण ! यद्यपि यह लंका स्वर्णमयी है, तथापि मुझे इसमें रुचि नहीं है। क्योंकि जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी देखें।
इसी को पथ पर आगें बढ़ते हुए हजारों, लाखों भारती के पुत्रों ने अपनें जीवन को इसकी सेवा में लगा दिया।हजारों बलिदान हुए है तभी हम अपने अस्तित्व को जीवित पाते है। जम्बूदीप की सीमाएं लगातार सिकुड़ती जा रही है।इन सीमाओं को सुरक्षित रखनें हेतु ही राष्ट्र प्रथम की भावना आवश्यक है।
©️ राष्ट्रवादी साहित्य।

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